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Showing posts with the label गुलज़ार
उसे आईलाइनर पसंद था, मुझे काजल। वो फ्रेंच टोस्ट और कॉफी पे मरती थी, और मैं अदरक की चाय पे। उसे नाइट क्लब पसंद थे, मुझे रात की शांत सड़कें। शांत लोग मरे हुए लगते थे उसे, मुझे शांत रहकर उसे सुनना पसंद था। लेखक बोरिंग लगते थे उसे, पर मुझे मिनटों देखा करती जब मैं लिखता। वो न्यूयॉर्क के टाइम्स स्कवायर, इस्तांबुल के ग्रैंड बाजार में शॉपिंग के सपने देखती थी, मैं असम के चाय के बागानों में खोना चाहता था। मसूरी के लाल डिब्बे में बैठकर सूरज डूबना देखना चाहता था। उसकी बातों में महँगे शहर थे, और मेरा तो पूरा शहर ही वो। न मैंने उसे बदलना चाहा न उसने मुझे। एक अरसा हुआ दोनों को रिश्ते से आगे बढ़े। कुछ दिन पहले उनके साथ रहने वाली एक दोस्त से पता चला, वो अब शांत रहने लगी है, लिखने लगी है, मसूरी भी घूम आई, लाल डिब्बे पर अँधेरे तक बैठी रही। आधी रात को अचानक से उनका मन अब चाय पीने को करता है। और मैं...... मैं भी अब अक्सर कॉफी पी लेता हूँ किसी महँगी जगह बैठकर। 😊 (Poet - Bhaskar (Not sure))
बुज़ुर्गों के कमरे से होता हुआ सीढ़ियों से गुज़र के , दबे पाँव छत पे चला आया था मैं , मैं आया था  तुमको जगाने चलो भाग जायें , अंधेरा है और सारा घर सो रहा है, अभी वक़्त है सुबह की पहली गाड़ी का वक़्त हो रहा है !! अभी पिछले स्टेशन से छूटी नहीं है ! वहाँ से जो छूटेगी तो गार्ड इक लम्बी सी कूक देगा !! इसी मुँह अंधेरे में गाँव के "टी-टी"से बचते बचाते , दोशालों की बुकल में चेहरे छुपाये निकल जायेंगे हम मगर तुम बड़ी मीठी सी नींद में सो रही थीं,दबी सी हँसी थी लबों के किनारे पे महकी हुई , गले पे इक उधड़ा हुआ ताँगा कुर्ती से निकला हुआ, साँस छू छू के बस कँपकपाये चला जा रहा था , तर्बे साँसों की बजती हुई हल्की हल्की, हवा जैसे सन्तूर के तार पर मींढ लेती हुई, बहुत देर तक मैं सुनता रहा बहुत देर तक अपने होंठों को आँखों पर रख के तुम्हारे किसी ख़्वाब को प्यार करता रहा मैं, नहीं जागीं तुम और मेरी जगाने की हिम्मत नहीं हो सकी लौट आया !! सीढ़ियों से उतर के बुज़ुर्गों के कमरे से होता हुआ मुझे क्या पता था कि मामू के घर से उसी रोज़ , वह तुमको ले जायेंगे तुम्हें छोड़कर ज़िन्...

किताबें झाँकती हैं...

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किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकातें नहीं होती जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़ जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे कभी गोदी में लेते थे कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे उनका क्या होगा वो शायद अब नही होंगे!! *गुलजार*🍃