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Showing posts from March, 2017

बघ जमतंय का?

नुसताच वरवर चाचपडतोस चेहेऱ्यावरच्या खाणाखुणांत भाव शोधतोस रीतभात जपून भौतिकाचे पडसाद उमटलेला मुखवटा असतो रे चेहेरा हा दिसणारा चेहेरा विसरावा लागेल अंतःकरण वाचावं लागेल जोखीम तर आहेच ... पत्करावी लागेल बघ जमतंय का ? खरे भाव समजायचेत तर आत्म्याच्या गर्भाला स्पर्षाव लागेल मनाच्या अथांग अंधाऱ्या डोहात खोल खोल उतरावं लागेल स्वतःला विसरून माझ्यात सख्या रे अलगद हरवावं लागेल जोखीम तर आहेच ... पत्करावी लागेल बघ जमतंय का ? आत असतील काही अडगळी जपलेल्या जुन्या जखमांचे व्रण, दुखऱ्या भावनांचे पापुद्रे ठसठसणारे ओले ओघळते ... जराश्या धक्क्याने भळभळणारे जाणिवांचा डोह खंगाळून काढून  घट्ट जीर्ण दार उघडाव लागेल आत्मीयतेची फुंकर घालत हळुवार जीव ओतावा लागेल हळवे मन जिंकावे लागेल...  जोखीम तर आहेच ... पत्करावी लागेल बघ जमतंय का ? काठावर बसून नुसतेच न्याहाळण्यापेक्षा अंतःकरणाच्या गाभ्यात भावना शोधल्या तरच दिसतील .. तुझ्यात गुंततील भावभावनांच्या कल्लोळातही मग तुझ्याच मनात घर करतील पण ते होण्यासाठी ....
जातांना तो म्हणाला.. 'तुला मोकळं केलंय, जा जग तुझं जिनं … तू तुझं बघून घे' ती थांबली गहिवरली, मुसमुसली सावरून, डोळ्यातले अश्रु आवरून दोन्ही हाताचे तळवे समोर धरून म्हणाली " हे हात बघतोस ? तुझ्या हाती दिले तेव्हा तू घट्ट धरलेस तुझ्या मुठीत…. अन ओढून घेतलेस मिठीत ती मुठ म्हणजे माझं जग होतं आणि ती मिठी म्हणजेच जगणं …तुझ्यावर प्रेम कमी होऊ नये हि काळजी घेणं हेच एवढ्या वर्षात 'मी माझं बघणं' मुठ सोडलीस मिठी तोडलीस तरी तुलाही मोकळं होता येणार नाही …… माझ्याशिवाय तुला सख्या रे बघ जगताच येणार नाही
उसे आईलाइनर पसंद था, मुझे काजल। वो फ्रेंच टोस्ट और कॉफी पे मरती थी, और मैं अदरक की चाय पे। उसे नाइट क्लब पसंद थे, मुझे रात की शांत सड़कें। शांत लोग मरे हुए लगते थे उसे, मुझे शांत रहकर उसे सुनना पसंद था। लेखक बोरिंग लगते थे उसे, पर मुझे मिनटों देखा करती जब मैं लिखता। वो न्यूयॉर्क के टाइम्स स्कवायर, इस्तांबुल के ग्रैंड बाजार में शॉपिंग के सपने देखती थी, मैं असम के चाय के बागानों में खोना चाहता था। मसूरी के लाल डिब्बे में बैठकर सूरज डूबना देखना चाहता था। उसकी बातों में महँगे शहर थे, और मेरा तो पूरा शहर ही वो। न मैंने उसे बदलना चाहा न उसने मुझे। एक अरसा हुआ दोनों को रिश्ते से आगे बढ़े। कुछ दिन पहले उनके साथ रहने वाली एक दोस्त से पता चला, वो अब शांत रहने लगी है, लिखने लगी है, मसूरी भी घूम आई, लाल डिब्बे पर अँधेरे तक बैठी रही। आधी रात को अचानक से उनका मन अब चाय पीने को करता है। और मैं...... मैं भी अब अक्सर कॉफी पी लेता हूँ किसी महँगी जगह बैठकर। 😊 (Poet - Bhaskar (Not sure))
बुज़ुर्गों के कमरे से होता हुआ सीढ़ियों से गुज़र के , दबे पाँव छत पे चला आया था मैं , मैं आया था  तुमको जगाने चलो भाग जायें , अंधेरा है और सारा घर सो रहा है, अभी वक़्त है सुबह की पहली गाड़ी का वक़्त हो रहा है !! अभी पिछले स्टेशन से छूटी नहीं है ! वहाँ से जो छूटेगी तो गार्ड इक लम्बी सी कूक देगा !! इसी मुँह अंधेरे में गाँव के "टी-टी"से बचते बचाते , दोशालों की बुकल में चेहरे छुपाये निकल जायेंगे हम मगर तुम बड़ी मीठी सी नींद में सो रही थीं,दबी सी हँसी थी लबों के किनारे पे महकी हुई , गले पे इक उधड़ा हुआ ताँगा कुर्ती से निकला हुआ, साँस छू छू के बस कँपकपाये चला जा रहा था , तर्बे साँसों की बजती हुई हल्की हल्की, हवा जैसे सन्तूर के तार पर मींढ लेती हुई, बहुत देर तक मैं सुनता रहा बहुत देर तक अपने होंठों को आँखों पर रख के तुम्हारे किसी ख़्वाब को प्यार करता रहा मैं, नहीं जागीं तुम और मेरी जगाने की हिम्मत नहीं हो सकी लौट आया !! सीढ़ियों से उतर के बुज़ुर्गों के कमरे से होता हुआ मुझे क्या पता था कि मामू के घर से उसी रोज़ , वह तुमको ले जायेंगे तुम्हें छोड़कर ज़िन्...

किताबें झाँकती हैं...

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किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकातें नहीं होती जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती हैं क़िताबें उन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है जो कदरें वो सुनाती थी कि जिनके जो रिश्ते वो सुनाती थी वो सारे उधरे-उधरे हैं कोई सफा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है कई लफ्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं बिना पत्तों के सूखे टुंड लगते हैं वो अल्फ़ाज़ जिनपर अब कोई मानी नहीं उगते जबां पर जो ज़ायका आता था जो सफ़ा पलटने का अब ऊँगली क्लिक करने से बस झपकी गुजरती है किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, वो कट गया है कभी सीने पर रखकर लेट जाते थे कभी गोदी में लेते थे कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बनाकर नीम सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भी मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल और महके हुए रुक्के किताबें मँगाने, गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे उनका क्या होगा वो शायद अब नही होंगे!! *गुलजार*🍃

आओ की कोई ख्वॉब बुने...!

शेखर पाटिल यांचा एक आवडलेला लेख... *************************** आज साहिरचा जन्मदिवस. आपले आयुष्य समृध्द करणार्‍यांपैकी हा एक. कविता आणि गीत या दोन्ही प्रकारांमध्ये समान ताकदीने सृजन करणारा अन् याहूनही महत्वाची बाब म्हणजे आयुष्य आपल्याच धुंदीत जगणारा एक मनस्वी, कलंदर. उर्दूतील ‘तरक्कीपसंद’ अर्थात प्रगतीशील लेखकांच्या चळवळीत साहिरचे नाव कधी काळी आघाडीवर होते. अर्थात विचारांमधील मार्क्सवाद हा त्याच्या सृजनात नक्कीच उमटला तरी तो पोथिनिष्ठ नव्हता. प्रचारकी थाटाचे काव्य कधी त्याने स्त्रवले नाही.  मात्र ‘जला दो इसे, फुंक डालो ये दुनिया...’ सारख्या जळजळीत शब्दांत शोषितांविषयीचा कळवळा त्याच्याइतक्या समर्थपणे कुणी मांडलाही नाही. त्याने जीवनाचे विविध रंग आपल्या सृजनातून इतक्या कुशलतेने चित्रीत केलेय की कुणीही थक्क झाल्याशिवाय राहत नाही. गुरूदत्त हे हिंदी सिनेसृष्टीला पडलेले एक स्वप्न होते. त्यांच्या यशात साहिरचा वाटा कुणी नाकारू शकणार नाही. साहिरच्या जन्मदिवसालाच ‘जागतिक महिला दिवस’ असल्याचा योगायोगही किती अफलातून आहे बघा. पुरूषाच्या जीवनात स्त्री ही माता, भगिनी, प्रेयसी, सहचारिणी आदी...